गुरुवार, 4 मार्च 2010
मंगलवार, 16 दिसंबर 2008
एक चिङिया.......एक कालजयी एनीमेशन फिल्म
बचपन मैं दूरदर्शन पर आप लोगों ने ये फिल्म जरूर देखी होगी...कईयों को तो इसका गीत भी याद होगा....अनेकता मैं एकता का संदेश देने वाले इस वीडियों को देखकर आप लोगों को अपना बचपन जरूर याद आयेगा आइये देखें.....
सोमवार, 15 दिसंबर 2008
शनिवार, 13 दिसंबर 2008
गुरुवार, 27 नवंबर 2008
तलाशने गया था वह
अपनों के कातिलों को
कातिल पकड़ा गया
तो कोई
अपना ही निकला
फिर मारा गया वह
अपना कर्तव्य करते हुए,
अब तो शर्म
करो!
अपनों के कातिलों को
कातिल पकड़ा गया
तो कोई
अपना ही निकला
फिर मारा गया वह
अपना कर्तव्य करते हुए,
अब तो शर्म
करो!
आदरणीय द्विवेदी जी
धन्यवाद
मेरी पोस्ट मीडिया द्वारा आतंकवाद को धर्म के नाम पर महिमांमंडित जिस तरह से
मीडिया ने किया है ..इस बात पर है..हिंदु आतंकवाद...मुस्लिम आतंकवाद....इस एपीसोड
ने आतंकवाद के खिलाफ लङाई को कमजोर किया है.....देखा जाये तो ये किसी देशद्रोह से
कम नहीं.....सिर्फ और सिर्फ हिंदु को बदनाम करने की जिद मैं वे लोग भूल गये कब वे
देश मैं फैले आतंकवाद का समर्थन करने लगे.....आप के विचार से क्या किया है ताज पर
हमले करके इन आतंकवादियों ने....साध्वी के हमले का बदला ही तो लिया है
....अल्पसंख्यकों पर हमलों का बदला ही तो लिया है(ये भी उन्होने चैनल वालों को फोन
करके ही बताया है...क्यों कि वे ही इन मजलूमों की आवाज को आप जैसे बुद्धिजीवियों तक
पहुंचा सकें ....जो गला फाङ फाङ कर फिर ये बता सकें कि देखों मैं तो एक धर्म पर
विश्वास न करने वाला मिस्टैकनली बोर्न हिंदु हूं....और देखो ये लोग जो कर रहे हैं
बिचारे इनके पास करने के लिए औऱ कुछ नहीं बल्कि इन्होने तो ये सब करना ही था
)
मीडिया ने किया है ..इस बात पर है..हिंदु आतंकवाद...मुस्लिम आतंकवाद....इस एपीसोड
ने आतंकवाद के खिलाफ लङाई को कमजोर किया है.....देखा जाये तो ये किसी देशद्रोह से
कम नहीं.....सिर्फ और सिर्फ हिंदु को बदनाम करने की जिद मैं वे लोग भूल गये कब वे
देश मैं फैले आतंकवाद का समर्थन करने लगे.....आप के विचार से क्या किया है ताज पर
हमले करके इन आतंकवादियों ने....साध्वी के हमले का बदला ही तो लिया है
....अल्पसंख्यकों पर हमलों का बदला ही तो लिया है(ये भी उन्होने चैनल वालों को फोन
करके ही बताया है...क्यों कि वे ही इन मजलूमों की आवाज को आप जैसे बुद्धिजीवियों तक
पहुंचा सकें ....जो गला फाङ फाङ कर फिर ये बता सकें कि देखों मैं तो एक धर्म पर
विश्वास न करने वाला मिस्टैकनली बोर्न हिंदु हूं....और देखो ये लोग जो कर रहे हैं
बिचारे इनके पास करने के लिए औऱ कुछ नहीं बल्कि इन्होने तो ये सब करना ही था
)
वैसे हो सकता है आपका शर्म करने का क्राईटैरिया कुछ अलग हो......मुझे तो तब भी
शर्म आ रही थी जब साध्वी को ...हिंदु को ...बदनाम करने के चक्कर मैं मीडिया बार बार
बिना साबित हुई चीजों को बार बार दिखा रहा था औऱ ये साबित करने मैं लगा था कि
आतंकवाद सिर्फ आतंकवाद नहीं होता ...ये हिंदु होता है और मुसलमान भी होता
है.......इसलिए यदि कोई आतंकवादी घटना हो तब सोचे कि किसने की और फिर ये निश्चित
करें कि क्या करना है....और आज भी उतना ही दुख है ..गुस्सा है...आक्रोश है......और
इस सब के लिए कुछ करने की जबर्दस्त इच्छा है....बिना ये सोचे की वे हमलावर हिंदु थे
या मुसलमान.....वे सिर्फ आतंकवादी नहीं हैं बल्कि देश के दुश्मन हैं......मेरे
दुश्मन है...भारत माता के दुश्मन हैं(एनी आब्जेक्शन)
शर्म आ रही थी जब साध्वी को ...हिंदु को ...बदनाम करने के चक्कर मैं मीडिया बार बार
बिना साबित हुई चीजों को बार बार दिखा रहा था औऱ ये साबित करने मैं लगा था कि
आतंकवाद सिर्फ आतंकवाद नहीं होता ...ये हिंदु होता है और मुसलमान भी होता
है.......इसलिए यदि कोई आतंकवादी घटना हो तब सोचे कि किसने की और फिर ये निश्चित
करें कि क्या करना है....और आज भी उतना ही दुख है ..गुस्सा है...आक्रोश है......और
इस सब के लिए कुछ करने की जबर्दस्त इच्छा है....बिना ये सोचे की वे हमलावर हिंदु थे
या मुसलमान.....वे सिर्फ आतंकवादी नहीं हैं बल्कि देश के दुश्मन हैं......मेरे
दुश्मन है...भारत माता के दुश्मन हैं(एनी आब्जेक्शन)
....ये बिना सोचे समझे ..विना पूरी पोस्ट पढे....बिना उसका सार समझे आपको शर्म
आनी चाहिये या मुझे सोचने का विषय है...श्री हेमंत करकरे की शहादत के बारे मैं शायद
आपसे कुछ ज्यादा ही गंभीर हूं मैं.....मेरी पोस्ट की अंतिम पंक्तियों मैं उनकी
शहादत को नमन किया गया हैं........
आनी चाहिये या मुझे सोचने का विषय है...श्री हेमंत करकरे की शहादत के बारे मैं शायद
आपसे कुछ ज्यादा ही गंभीर हूं मैं.....मेरी पोस्ट की अंतिम पंक्तियों मैं उनकी
शहादत को नमन किया गया हैं........
गुरुवार, 13 नवंबर 2008
करीब सात आठ महिने पहिले एक नवयुवति ने अपना मुंह ढके हुए मेरे क्लिनिक मैंप्रवेश किया ऱऔर आते ही रोने लगी.साथ मैं उसकी चाची ने उसे ढाढस बंधाया और मुंहउघाङने को कहा......पूरा चेहरा मवाद और रक्त से भरा हुआ था और सूजा हुआ था.उसकीआंखे ठीक से नहीं खुल पा रही थी...बात करने पर पता चला कि ये समस्या पिछले दो सालसे है पर छ महिने पहिले ही एकाएक बढ कर इस रूप मैं हो गईहै....अब उसका विवाह होने वाला था कुछ दिनों मैं इसलिए वो कुछ ज्यादा ही परेशान हो गई......उसके साथ आई महिला जो कि उसकी चाची थी ने बता या कि वह कुछ दिन पहले एक बार आत्महत्या का विफल प्रयास भीकर चुकी है....कुल मिलाकर स्थिति विकट थी...खैरमैने उसे ढाढस बंधाया और हर संभव सहायता का भरोसा दिलाया. और विश्वास दिलाया कि वह काफी कुछ ठीक होजायेगी...विश्वास होने पर उसका रोना बंद हुआ.......और आगे से ऐसा कुछ नहीं करने की हिदायत दी.......
मैने अपना निदान तब तक सोच लिया था....यह एक्नि वल्गैरिस (मुंहासे) ग्रैड 5 थाऔर तब तक मैं उसे दिया जाने वाला उपचार की रूपरेखा भी मस्तिष्क मैं बना चुकाथा......तब मैंने आइसोट्रिटिनोइन नामक एकऔषधी प्रारंभ करने के वारे मैं विचार किया...पर कुछ कठिनाइयां थी एक तो यह औषधीमंहगी बहुत थी महिने की करीब 1300 -1400 की दवाई और कम से कम चार पांच महिने तकचलने वाली थी और दूसरे दवाई बंद करने के बाद करीब डेढ साल तक वह गर्भ धारण नहीं करसकती थी ...क्यों कि होने वाले बच्चे मैं गंभीरपरिणाम हो सकते हैं.....
जल्द ही दोनों समस्याओं का समाधान हो गया क्यों कि गर्भ धारण करने की बात वो मान गइ और दवाईयां मैंने उसकी आर्थिक स्थिति देखकर उससे वादा किया कि मैं किसी भी तरह जितना हो सकेगा अपने पास् से दूंगा कम से कम एक तिहाई .........
खैर उपचार प्रारंभ हुआ वो हर पंद्रह दिन मैं आती थी दवाई लेने ....प्रारंभ मै औषधियों का असर थोङा कम होता हैं ...इसलिए वो बार बार हिम्मत हार जाती पर मैने उसे मानसिक और दवाइयों से दोनों तरह से पूरा सहयोग दिया और उसकी हिम्मत बनाए रखी .पर एक बात मुझे खटकती ती वो ये कि वो मुफ्त की दवाइयां तो मेरे से लेती थी पर बाकि दवाइयां मेरे क्लिनिक पर स्थित मैडीकल स्टोर की जगह अपने किसी रिश्तेदार की दुकान से लेती थी........वैसे कभी भी मैं इस चीज का ध्यान कभी नहीं रखता कि कौन यहां से दवाइ लेता है कौन नहीं ....पर चूंकि मैं इस रोगी की इतनी सहायता कर रहा था इस लिए शायद मुझे ये अटपटा लगा......
धीरे धीरे वो ठीक होने लगी ...मैं स्वयं परिणाम से संतुष्ट था और वो भी प्रसन्न थी....करीब पांच महिने बाद एक दिन बङे ही प्रसन्न मुख से उसने मेरे क्लिनिक मैं प्रवेश किया और बोली ..सर दो दिन बाद मेरी शादी है .....आज उसका चेहरा दमक रहा था ,चेहरे के निशान काफी कुछ साफ हो चले थे और बहुत सुंदर दिख रही थी आज...........मैं स्वयं विश्वास नहीं कर पा रहा था कि यह वही लङकी है जो उस दिन पहचान मैं नहीं आ रही थी और जिसका रो रोकर बुरा हाल था.मैंने उसे अंतिम पंद्रह दिन की दवाइयां लिखकर महिने दो महिने मैं वापिस दिखाने को कहकर उसे विदा किया...जाते जाते उसने पलटकर धन्यवाद दिया और दरवाजे के बाहर निकल गई.
ठीक दस मिनिट बाद हरीराम जो कि मेरी फार्मेसी संभालता है ,घबराया हुआ अंदर आया ...सर जो लङकी आईसोट्रिटिनइन लेती है वो दवाई दिखाने आई थी क्या...मैने कहा नहीं वो को वैसे भी अपने यहां से दवाई नहीं लेती है....क्या हुआ......दिखाने के बाद दवाई लेकर तो नहीं आई.....
साब उसने कभी यहां से दवाई नहीं खरीदी.....आज पंद्रह दिन की जगह उसने दो महिने की दवाई ली और आपको दिखाने का नाम लेकर अंदर आई थी....पर वापिस नहीं दिखी........
जिस लङकी को पिछले छै महीने से कि उसके अंधकार मय जीवन मैं एक तरह उजाला हो इसलिए पूरा मन लगाकर मेरे से जितनी संभव है उतनी सहायता की .....वो पूरे ढाई हजार की दवाईयां लेकर गायव हो चुकी थी
मैने अपना निदान तब तक सोच लिया था....यह एक्नि वल्गैरिस (मुंहासे) ग्रैड 5 थाऔर तब तक मैं उसे दिया जाने वाला उपचार की रूपरेखा भी मस्तिष्क मैं बना चुकाथा......तब मैंने आइसोट्रिटिनोइन नामक एकऔषधी प्रारंभ करने के वारे मैं विचार किया...पर कुछ कठिनाइयां थी एक तो यह औषधीमंहगी बहुत थी महिने की करीब 1300 -1400 की दवाई और कम से कम चार पांच महिने तकचलने वाली थी और दूसरे दवाई बंद करने के बाद करीब डेढ साल तक वह गर्भ धारण नहीं करसकती थी ...क्यों कि होने वाले बच्चे मैं गंभीरपरिणाम हो सकते हैं.....
जल्द ही दोनों समस्याओं का समाधान हो गया क्यों कि गर्भ धारण करने की बात वो मान गइ और दवाईयां मैंने उसकी आर्थिक स्थिति देखकर उससे वादा किया कि मैं किसी भी तरह जितना हो सकेगा अपने पास् से दूंगा कम से कम एक तिहाई .........
खैर उपचार प्रारंभ हुआ वो हर पंद्रह दिन मैं आती थी दवाई लेने ....प्रारंभ मै औषधियों का असर थोङा कम होता हैं ...इसलिए वो बार बार हिम्मत हार जाती पर मैने उसे मानसिक और दवाइयों से दोनों तरह से पूरा सहयोग दिया और उसकी हिम्मत बनाए रखी .पर एक बात मुझे खटकती ती वो ये कि वो मुफ्त की दवाइयां तो मेरे से लेती थी पर बाकि दवाइयां मेरे क्लिनिक पर स्थित मैडीकल स्टोर की जगह अपने किसी रिश्तेदार की दुकान से लेती थी........वैसे कभी भी मैं इस चीज का ध्यान कभी नहीं रखता कि कौन यहां से दवाइ लेता है कौन नहीं ....पर चूंकि मैं इस रोगी की इतनी सहायता कर रहा था इस लिए शायद मुझे ये अटपटा लगा......
धीरे धीरे वो ठीक होने लगी ...मैं स्वयं परिणाम से संतुष्ट था और वो भी प्रसन्न थी....करीब पांच महिने बाद एक दिन बङे ही प्रसन्न मुख से उसने मेरे क्लिनिक मैं प्रवेश किया और बोली ..सर दो दिन बाद मेरी शादी है .....आज उसका चेहरा दमक रहा था ,चेहरे के निशान काफी कुछ साफ हो चले थे और बहुत सुंदर दिख रही थी आज...........मैं स्वयं विश्वास नहीं कर पा रहा था कि यह वही लङकी है जो उस दिन पहचान मैं नहीं आ रही थी और जिसका रो रोकर बुरा हाल था.मैंने उसे अंतिम पंद्रह दिन की दवाइयां लिखकर महिने दो महिने मैं वापिस दिखाने को कहकर उसे विदा किया...जाते जाते उसने पलटकर धन्यवाद दिया और दरवाजे के बाहर निकल गई.
ठीक दस मिनिट बाद हरीराम जो कि मेरी फार्मेसी संभालता है ,घबराया हुआ अंदर आया ...सर जो लङकी आईसोट्रिटिनइन लेती है वो दवाई दिखाने आई थी क्या...मैने कहा नहीं वो को वैसे भी अपने यहां से दवाई नहीं लेती है....क्या हुआ......दिखाने के बाद दवाई लेकर तो नहीं आई.....
साब उसने कभी यहां से दवाई नहीं खरीदी.....आज पंद्रह दिन की जगह उसने दो महिने की दवाई ली और आपको दिखाने का नाम लेकर अंदर आई थी....पर वापिस नहीं दिखी........
जिस लङकी को पिछले छै महीने से कि उसके अंधकार मय जीवन मैं एक तरह उजाला हो इसलिए पूरा मन लगाकर मेरे से जितनी संभव है उतनी सहायता की .....वो पूरे ढाई हजार की दवाईयां लेकर गायव हो चुकी थी
आगजनी और तोङ फोङ होती
मीडिया और हमारे बुद्धिजीवी जब तक प्रत्येक घटना साम्प्रदायिकता के चश्मे से देखकर उसाका विश्लेषण करेंगे तब तक कैसे संभव है कि जो लोग वाकइ मैं सामप्रदायिकता फैलाना चाहते हैं इस देश मैं वे सही रास्ते पर लाये जा सकें...किसी घटना को मीडिया मैं तवज्जों कितनी और किस प्रकार की मिलने वाली हैं यह इस बात पर निर्भर करता हैं कि वह किसने कारित की हैं...हिंदू ने या मुसलमान ने यहां करने वाला हिंदु हुआ तो ...तब वह आदमखोर हिंदु ...और यदि मुसलामान या ईसाई हुआ तो वह किसी धर्म या संप्रदाय विशेष के लोगों ने ....ऐसा बोलकर प्रचारित की जाती है.बुद्धिजीवियों की शब्दावली भी यही होती हैं,जब तक ये होता रहेगा तब तक ये कैसे संभव है कि एक सामान्य व्यक्ति इन सब को तटस्थ मानें..
यदि हम वाकई ये चाहते हैं कि हमारे देश का धर्म निरपेक्षता बची रहै और सभी संप्रदाय के लोग यहां मिलजुल कर खुशी खुशी रहें तो यह सब बंद होना ही चाहियें,क्यों हम किसी आतंकवादी या उग्रवादी घटना के बाद उसे संप्रदाय के आधार पर उसका विचार संप्रदाय के आधार पर करें.क्या हिंदु को दर्द कम होता है या मुसलमान के मरने से उसके घर वाले कम दुःखी होते हैं.
विशेष बात ये है कि ये सब वे लोग कर रहें हैं जो अपने आप को धर्मनिरपेक्षता का झंडा वरदार समझते हैं,हाले के दिनों मैं ऐसे कई सारे उदाहरण सामने आये हैं जिनसे ये बात स्पष्ट होती है...
दो एक साल पहले मूसा खेङा नाम की ऐक जगह है अलवर (राजस्थान) के पास वहां पांछ छ सिख भाईयों की हत्या कर दी गई थी..हत्या भी एकदम तालिबानी तरीके से की गई थी उनमें से प्रत्येक के टुकङे टुकङे कर दियें गये और एक को पैङ पर लटकाकर उसके पहले हाथ पैर काटे गये फिर आंखे निकाल ली गई...इतना ही नहीं बल्कि घर की महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार किया गया कुल मिलाकर एक हंसता खेलता परिवार बङे ही क्रूर तरीके से मार दिया गया अब उस घर मैं सिर्फ विधवा महिलायें और बच्चे ही बाकी बचे हैं .
इस घटना का पता राजस्थान के ही दूसरे हिस्सों मैं तब लगता हैं जब वहां कि जनता बंद का ऐलान करती हैं और वहां एक दो जगह आगजनी और तोङ फोङ होती हैं ... तो अखबारों ने छापा कि हिंदु अतिवादी संगठनों की दादा गिरी....बाकी इस घटना से न तो किसी मीडिया और तथाकथित बुद्धिजीवी का पैट का पानी भी नहीं हिला.किसी अखबार ने संपादकीय तो छोङो ...उन मृतकों के लिए दो लाइने भी खराब नहीं की.....
क्या उनके खून का रंग ग्राहम स्टैंस के खून से सफेद था...क्या मानवता यही कहती हैं...उन महिलाओं की इज्जत उङीसा की नन से ज्यादा सस्ती थी....पर ग्राहम स्टैंस के हत्यारे को फांसी की सजा सुनाई जाती हैं और उन्हें पद्म श्री दी जाती है स्टैंस की पत्नी सरकारी मैहमान बनकर दिल्ली आती हैं..दूसरी ओर उन भाइयों के परिवार वाले आज भी न्याय के लिए दर दर भटक रहे हैं.
क्या बुद्धीजीवी का अर्थ ये तो नहीं कि बुद्धि बेच बाचकर आजीवीका चलाने वाले,.....क्या मानवाधिकार भी हिंदु या मुसलमान के लिए या ईसाई के अलग होता है ...विचार करें...क्या करेंगे ऐसी धर्म निरपेक्षता का...
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यदि हम वाकई ये चाहते हैं कि हमारे देश का धर्म निरपेक्षता बची रहै और सभी संप्रदाय के लोग यहां मिलजुल कर खुशी खुशी रहें तो यह सब बंद होना ही चाहियें,क्यों हम किसी आतंकवादी या उग्रवादी घटना के बाद उसे संप्रदाय के आधार पर उसका विचार संप्रदाय के आधार पर करें.क्या हिंदु को दर्द कम होता है या मुसलमान के मरने से उसके घर वाले कम दुःखी होते हैं.
विशेष बात ये है कि ये सब वे लोग कर रहें हैं जो अपने आप को धर्मनिरपेक्षता का झंडा वरदार समझते हैं,हाले के दिनों मैं ऐसे कई सारे उदाहरण सामने आये हैं जिनसे ये बात स्पष्ट होती है...
दो एक साल पहले मूसा खेङा नाम की ऐक जगह है अलवर (राजस्थान) के पास वहां पांछ छ सिख भाईयों की हत्या कर दी गई थी..हत्या भी एकदम तालिबानी तरीके से की गई थी उनमें से प्रत्येक के टुकङे टुकङे कर दियें गये और एक को पैङ पर लटकाकर उसके पहले हाथ पैर काटे गये फिर आंखे निकाल ली गई...इतना ही नहीं बल्कि घर की महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार किया गया कुल मिलाकर एक हंसता खेलता परिवार बङे ही क्रूर तरीके से मार दिया गया अब उस घर मैं सिर्फ विधवा महिलायें और बच्चे ही बाकी बचे हैं .
इस घटना का पता राजस्थान के ही दूसरे हिस्सों मैं तब लगता हैं जब वहां कि जनता बंद का ऐलान करती हैं और वहां एक दो जगह आगजनी और तोङ फोङ होती हैं ... तो अखबारों ने छापा कि हिंदु अतिवादी संगठनों की दादा गिरी....बाकी इस घटना से न तो किसी मीडिया और तथाकथित बुद्धिजीवी का पैट का पानी भी नहीं हिला.किसी अखबार ने संपादकीय तो छोङो ...उन मृतकों के लिए दो लाइने भी खराब नहीं की.....
क्या उनके खून का रंग ग्राहम स्टैंस के खून से सफेद था...क्या मानवता यही कहती हैं...उन महिलाओं की इज्जत उङीसा की नन से ज्यादा सस्ती थी....पर ग्राहम स्टैंस के हत्यारे को फांसी की सजा सुनाई जाती हैं और उन्हें पद्म श्री दी जाती है स्टैंस की पत्नी सरकारी मैहमान बनकर दिल्ली आती हैं..दूसरी ओर उन भाइयों के परिवार वाले आज भी न्याय के लिए दर दर भटक रहे हैं.
क्या बुद्धीजीवी का अर्थ ये तो नहीं कि बुद्धि बेच बाचकर आजीवीका चलाने वाले,.....क्या मानवाधिकार भी हिंदु या मुसलमान के लिए या ईसाई के अलग होता है ...विचार करें...क्या करेंगे ऐसी धर्म निरपेक्षता का...
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